रविवार, 21 फ़रवरी 2010

अखबारवाला


कल भोर में ही कानपुर लौट जाना है। इसलिए मामा से मिलने की आकुलता लगातार बढती ही जा रही है। क्‍योंकि गांव में शायद मैं ही इकलौता हूं, जो मामा का स्‍नेहपात्र हूं। ऐसा मेरे बचपन से ही है। सीताराम चाचा ने एक दिन मुझे बुलाकर अकेले में समझाया कि तुम उसको और बच्‍चों की तरह मामा मत कहना। तब से मैं मामा को कभी मामा कहकर नहीं बुलाता था। उनको अमीन साहब कहकर बुलाता था। जैसे किसी सिपाही को दीवान जी या किसी लेक्‍चरार को प्रोफेसर साहब कहने पर उसके अंदर जिस खुशी की अनुभूति होती है,  कहीं उससे अधिक मामा को जब जब मैं अमीन साहब कहकर पुकारता था, तो उनकी बांछें खिल जाया करती थीं। इसके कई फायदे थे। भीड में भी मामा मेरी बातों को तरजीह देते थे और साथ में गांव के अन्‍य बच्चों से अलग और सुशील होने का तमगा भी। 

कल सुबह मुलाकात हो या न हो, इसलिए आज रात में ही मामा से मिलने सीताराम चाचा के दरवाजे पहुंच गया। वहां देखा मामा नारद नाई की हजामत उल्‍टे उस्‍तरे से बना रहे थे। मामा बोले, कहते हैं कि पंछियों में कउवा (कौवा ) और आदमी में नउवा (नाई) बहुत चतुर सुजान होते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि ये दोनों जीव चतुर तो होते हैं, लेकिन धूर्त किस्‍म के चालाक होते हैं। नारद ने मामा के इस तर्क का प्रतिवाद किया। आप तो हर बात में अपनी सुविधा के हिसाब से तर्क और परिभाषा गढते हैं। ऐसा केवल मेरा मानना नहीं है, बल्कि यह विचार समूचे गांव का है। मामा कहां चुप रहने वाले थे। बोले, तुमको कब से यह गलतफहमी हो गई कि गांव वालों ने तुमको अपना भोंपा (प्रवक्‍ता) नियुक्‍त कर दिया है। तुम बोलो तो मान लिया जाए कि समूचा गांव बोल रहा है और तुम चुप रहो तो यह समझा जाए कि पूरे गांव ने अपनी जुबान पर ताला जड लिया है।

नारद का तीर निशाने पर लगा था। उसने मन ही मन सोचा लोहा गर्म हो गया है, क्‍यों न हथौडा मार दिया जाए। नारद थोडा और उत्‍साहित होकर लेकिन धीमी आवाज में बोला, मामा आप तो खामखा नाराज होने लगे।  अच्‍छा चलिए, एक सवाल है मेरा, बोलिए जवाब देंगे। मामा ने कहा हां हां पूछो। सोच लीजिए सवाल बहुत टेढा है। अरे तुम पूछो तो, बडे बडों की हिम्‍मत नहीं होती हमसे सवाल पूछने की, तुम अगर पूछना ही चाहते हो तो तुम्‍हारा स्‍वागत है। मामा फिर मैं कह रहा हूं सोच लीजिए, सवाल बहुत टेढा है। तुम तो ऐसे धमका रहे हो जैसे विद्योतमा कालिदास से सवाल पूछने वाली हों। मामा मैं अदना सा कम पढा लिखा गंवार आदमी। मुझे नहीं पता कि विद्योतमा और कालिदास कौन थे, लेकिन फिर एक बार कह रहा हूं मेरे सवाल का जवाब देना आपके लिए आसान नहीं होगा, सोच लीजिए। अरे जाओ, जब मेरे सामने दारोगा हाथ जोडकर खडा हो गया तो तुम किस खेत की मूली हो। अपना सवाल पूछो। 

अच्‍छा मामा, यह बताइए इतिहास में ऐसा कौन सा मामा है जिसकी लोग इज्‍जत से नाम लेते हैं। रावण का मामा मारीचि, सीता का अपहरण कराने का दोषी था। शकुनी मामा, द्रौपदी का चीरहरण कराकर महाभारत की नींव रख दिया। कंस मामा, जिसने अपनी बहन और बहनोई (जीजा) को जेल में डाल अपने भांजे (कृष्‍ण) के ही खून का प्‍यासा बना रहा। माहिल मामा जिसके कारण आल्‍हा उदल को अपने भाइयों का संहार करना पडा।

नारद एक एक उदाहरण रखता जा रहा था और उधर मामा की त्‍योंरियां चढती जा रही थीं। इधर नारद चुप हुआ उधर मामा ने गुस्‍सैल सांड जैसे नथुने फुलाते हुए बोले कि एक तो नाई और उपर से बाप ने नारद नाम रख दिया। एक तो करैला दूसरे नीम चढा। तुम्‍हारे सवाल का यही जवाब है, दूसरा कोई जवाब नहीं है। सीताराम चाचा की ओर इशारा करते हुए, यही हैं कि तुम लोगों को अपने सिर पर चढाए रखते हैं। मेरा चले तो तुम लोगों को मुंह न लगाउं।

चाचा समझ गए अब हस्‍तक्षेप नहीं किया तो बात बिगड जाएगी। इस चोंचलेबाजी की दिशा बदलते हुए चाचा सीधे मुझसे मुखातिब होते हुए बोले, तुम कब आई कानपुर से। मामा नारद संवाद में लोग इतने मशगूल थे कि किसी को भी मेरे वहां होने की सुधि नहीं थी। मैं जहां जाकर धीरे से बैठ गया वहां चाचा के लालाटेन की रोशनी भी कम पड रही थी, लेकिन शायद सीताराम चाचा ने देख लिया था। चाचा के पूछते ही वहां बैठे बीजी पंडित, बलेसर और जुम्‍मन मियां की मुझसे एक शिकायत थी। सबका यही कहना था कि भइया आप तो गांव को ही भूल गए हो। साल सालभर में आते हो। तीज त्‍योहार में भी नहीं आते। लेकिन मैं दावे के साथ यह कह सकता हूं कि मामा ने जब मुझे देखा तो थोडी देर पहले का आग भभूका उनका चेहरा खुशी से खिल उठा था। मुझे लगा इस तनावपूर्ण स्थिति में अचानक मेरा वहां प्रकट होना उनको सुकून दे रहा था। मैने मामा का अभिवादन किया। उन्‍होंने आशिर्वाद में अपना दोनों हाथ उठाया। उनके चेहरे पर ऐसा स्‍नेहिल मुस्‍कान तिर रहा था मानो उनके पास जितना भी स्‍नेह है वह सारा स्‍नेह मुझे दे रहे हैं। 

मामा तो मामा हैं। उनका स्‍वाभाविक गुण तो सामने वाले को चिकोटी काटना ही है। हमें जैसे इसकी कल्‍पना नहीं करनी चाहिए कि आदमी सांस लेना छोड दे, सांप विष त्‍याग दे या ज्‍वालामुखी आग और लावा उगलना छोड दे वैसे ही मामा टांग खिंचाई छोड दें, इसकी भी कल्‍पना नहीं करनी चाहिए। हम दोनों बहुत दिन बाद मिल रहे थे,  सो मामा यह जताने लगे कि वो मुझे जानते ही नहीं हैं। मामा ने वहां बैठे लोगों से पूछा,  इ भाई साहब कौन हैं। किसके घर के मेहमान हैं । मुझे यह समझने में तनिक भी देरी नहीं हुई कि नारद के बाद अब मेरी बारी है। हां यह भरोसा था कि नारद जितना तल्‍ख नहीं होगा हमला। क्‍योंकि मामा ने गांव के लोगों को अनेक कटैगरी में श्रेणीबद्ध कर रखा है। इसको सूचिबद्ध करने के उनके पैमाने हैं। मैं मामा की नजर में जिस कटैगरी का मानद सदस्‍य हूं उसमें ज्‍यादा तल्‍खी की गुंजाइश नहीं है। मैने दोनों हाथ जोडकर कहा, अमीन साहब मैं मनोरंजन। अच्‍छा अच्‍छा वही अखबार वाला। मामा से आज तक जो अखबारवाला अक्‍सर मिलता है, वह है सीताराम चाचा को रोज अखबार पहुंचाने वाला हाकर। मामा का मानना है कि अखबार के लिए काम करने वाला हर आदमी अखबार बेचता है। क्‍योंकि कई बार मुझसे पूछ चुके हैं कि अखबार बेचकर कितनी आमदनी हो जाती है। मैने सोचा  अखबारवालों के बारे में मामा के इस धारणा को बदला जाए। इससे हम टांग खिचाई से बच जाएंगे और मामा थोडा अपडेट भी हो जाएंगे। इसलिए उनको अखबार के एक एक काम को तफ़सील से बताया। उन्‍हें यह भी बताया कि इस बडी इंडस्‍टी में हम क्‍या काम करते हैं। हमने यह भी बताया कि देर रात तक जागकर आपके लिए यह अखबार तैयार करते हैं।

ऐसा लगा कि मामा को इस नई जानकारी से कुछ लेना देना नहीं हैं। उन्‍होंने कहा, बेटवा इससे तो बढिया है गांव आकर रहो। बुजुर्गों की अर्जित की हुई इतनी जमीन है। खेती बारी करोगे तो जितना पाते हो उससे अधिक पैदा करोगे। कम से कम रात में समय से सो तो सकोगे। भगवान दिन बनाया है जगने के लिए रात सोने के लिए। तुम तो भगवान के इस अनुशासन को रोज ही तोडते हो। न तो अपने चैन से सोते हो और न तो बाल बच्‍चों को चैन से सोने देते हो।

मामा का सुझाव कितना सही है या कितना गलत इसे हम आप पर छोडते हैं, लेकिन इस बातचीत में मुझे विनय बिहारी भाई की याद आ गई। वह कोलकाता जनसत्‍ता में काम करते हैं। उनके घर जो दाई (कामवाली) आती है उसने एक दिन विनय भाई की पत्‍नी से कहा, मेमसाहब साहब को किसी अच्‍छे डॉक्‍टर से क्‍यों नहीं दिखातीं। दाई के इस सुझाव पर भाभी ने पूछा,  साहब को डॉक्‍टर को क्‍यों दिखाउं। उनको क्‍या हुआ है। दाई ने कहा, लगभग तीन साल हो गए आपके घर काम करते हुए। जबसे मैं आ रही हूं, देखती हूं साहब बेड पर ही पडे हुए हैं। इतने दिनों से कोई बेड पर पडा हो तो गंभीर रोग का ही तो मरीज होगा। भाभी दाई की बात पर हंसते हुए बताई कि साहब अखबार में काम करते हैं। देर रात घर आते हैं तो देर तक सोते हैं। जब तुम झाडू पोंछा करके अपने घर जाती हो उसके एक घंटा बाद साहब उठते हैं। संयोग से तीज त्‍योहार छुटटी रहती है तो उस दिन तुम काम पर नहीं आती हो। 

इसके अलावा एक और रोचक कहानी हमारे एक अखबारी मित्र की भी है। उनका एक पांच साल का बेटा है। जब वह चार साल का हुआ तो स्‍कूल में दाखिल करने के लिए अपने परिवार को गांव से ले आए। जब वो दफ़तर से घर जाते हैं तो बेटा सोते हुए मिलता है। जब वो जगते हैं तो वह स्‍कूल जा चुका होता है। बेटे का दाखिला महंगे स्‍कूल में करा दिए सो घर का खर्च बढ गया। जिस अखबार में काम करते हैं वहां ओवरटाइम मिलता है,  इसलिए अपने साप्‍ताहिक अवकाश में भी वह काम करते हैं, ताकि घर का खर्च ठीक से चलता रहे। ऐसे में वह बेटे से मिल नहीं पाते हैं। एक दिन क्‍या हुआ कि दफ़तर में काम करते समय उनकी तबियत कुछ नासाज हुई तो वह छुटटी लेकर घर आ गए। वाहर से जब वह कॉलबेल बजाए तो उनका बेटा आया और स्‍टूल लगाकर डोर आई से देखा तो उसे कोई अपरिचित आदमी बाहर खडा दिखा। वह बिना दरवाजा खोले मां के पास पहुंचा और बोला, मां जो आदमी बाहर खडा है उसको मैं नहीं जानता। हां उसका फोटो आपके बेडरूम में लगा है। मां हंसने लगी और बेटे को पुचकारते हुए बताया कि बेटा ऐसा नहीं कहते, वो तुम्‍हारे पापा हैं। जाओ दरवाजा खोल दो। बेटा दौडा हुआ गया और दरवाजा खोल दिया। हमारे मित्र घर में घुसते ही बेटे को गोद में उठाकर जब अपनी पत्‍नी के पास पहुंचे तो उनको भाभी ने बेटे की बात बताईं। दोनों हसने लगे।               

1 टिप्पणी:

  1. sir ye to hamare peshe ki vidambana hai ki der rat tak kam karna padta hai. Vaise apne inhe bade hi rochak andaz me pesh kiya hai. Khaskar Kolkata wale mahashay ki kahani badi hi mazedaar rahi. Doosari wali ghtna padhkar bhi maza aaya. Vaise main bataun ki main aj tak apne DaDi ji ko samjha nahi paya ki main kya Kam karta hoon.

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