शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

टमाटर खाओ


सीताराम चाचा का भतीजा है गुडडू। मुंबई गया था कमाने। कल ही गांव आया है। जबसे उसके पांव गांव में पडे हैं, तबसे ही चाचा के मकान के आजू बाजू वालों को कभी मनोज तिवारी, कभी कल्‍पना, कभी निरहुआ तो कभी मालिनी अवस्‍थी के गानों का रसास्‍वादन हो रहा है। सुबह पांच बजे से लेकर रात 11 बजे तक उसका बाजा फुल वैल्‍यूम में मुतवातिर बज रहा है। वहां से आते जाते लोगों को पता है कि गुडडू आ गया है। चार महीने की बेसुरी शांति के बाद फिर टोला गुलजार हो गया है। अब फगुआ तक सीताराम चाचा के टोला में संगीत की स्‍वरलहरी बहेगी।

वैसे तो गुडडू के पास गिरजा देवी की ठुमरी, शारदा सिन्‍हा की कजरी, नुसरत फतेह अली खान के सूफी और गहमरी के निर्गुण गानों का बेहतरीन कलेक्‍शन है, लेकिन अब वसंत में होरी, जोगीरा और चैती की ही बहार रहेगी। सीताराम चाचा को निर्गुण पसंद हैं। इसलिए गुडडू सुबह की शुरूआत ..धोखा होई गा बालम उमरिया बचकानी ... (निर्गुण)  से ही करता है। बीजी, बलेसर, नारद और जुम्‍मन मियां अलग अलग तरह के संगीतों के कद्रदान हैं। बीजी को मालिनी अवस्‍थी के गाने अच्‍छे लगते हैं तो बलेसर के कानों को मनोज तिवारी का बगल वाली...  सुहाता है। जुम्‍मन मियां सूफी गानों के शौकीन हैं तो नारद चाहते हैं कि निरहुआ के ही गाने हर समय बजते रहें। गुडडू के लिए सबको संतुष्‍ट रखना कम जोखिम का काम नहीं है, लेकिन उसको पता है कि इन संगीत प्रेमियों को कैसे साधा जाता है।      

लेकिन इतना बडा संगीत प्रबंधक गुडडू एक मसले पर बहुत ही अभागा है।  31 साल के गुडडू के सारे दोस्‍त बाप बन गए हैं, लेकिन असंख्‍य देवी देवताओं की चौखट चूमने के बाद भी आज तक उसके हाथ हल्‍दी नहीं लगी। शादी नहीं होने से वह गांव में हमेशा उपहास का किरदार बन जाता है। अब तो छोटे छोटे बच्‍चे भी उसका मजाक उडाते हैं। हालांकि उसके चाहने वालों की भी गांव में कोई कमी नहीं है। इन सबकी संवेदना सदैव गुडडू के साथ रहती है। कोई कहता है शंकर जी की पूजा करो, शादी जरूर होगी। एक सौ बेलपत्र पर राम राम लिखकर लगातार सवा महीने तक भोला बाबा पर चढाओ। यह लग्‍न बांव (खाली)  नहीं जाएगा। जितने मुंह उतने शादी के तरीके। 20 साल का था तब से आजतक कई बार सवा सवा महीने भोला बाबा को प्रसन्‍न करने की कोशिश कर चुका है लेकिन पिछले 11 सालों से आज तक भोले बाबा भी नहीं पसीजे। डीह बाबा को पीठा (गुंथा हुआ आटा) और काली माई को सात चुनरी और सात कडाह भी चढा चुका है, लेकिन इनका भी आशिर्वाद गुडडू को नहीं मिला। कुलदेवी सती के चौरा को तो सुबह शाम पूजने जाता है, लेकिन वहां से आज तक निराशा ही हाथ लगी। पहले तो उसको देखने के लिए तिलकहरू (लडकी वाले) भी आते थे, अब तो वो भी नहीं आ रहे हैं।

बीजी पंडित का मानना है कि गांव में बहुत बियहकटवा हैं,  हो न हो उसी में से एक का शातिर दिमाग गुडडू की शादी नहीं होने देने के लिए चल रहा है। उसने अपने जासूसों के जरिये पता कर लिया है कि वह आदमी कौन है। चाचा को बीजी के इस बात पर कोई भरोसा नहीं होता। कभी उन्‍होंने उस तथाकथित बियहकटवा का नाम नहीं पूछा। चाचा को पता है गुडडू तो गांव भर के लोगों का दुलारा है। भला कौन नहीं चाहेगा कि गुडडू की शादी हो। चाचा जानते हैं कि गुडडू की शादी क्‍यों नहीं हो रही है। ज्‍यों ही बीजी गुडडू शादी पुराण शुरू करते हैं चाचा बात ही बदल देते हैं। चुप हो जाओ पंडित तुम भी बेसिर पैर की बात लेकर बैठ जाती हो। तुमको दुनिया में सबसे जरूरी काम गुडडू की शादी ही लगता है क्‍या। अरे दुनिया को छोडो गांव में ही चिन्‍ता करने के और भी कई वजहें हैं। इन वजहों पर तो तुम्‍हारी ध्‍यान नहीं जाती, लेकिन तुमको यह जरूर पता होती है कि पतरुआ की पतोहू का किससे लफडा चल रही है। सोते समय देवनाथ तेली के उपर गोबर किसने फेंकी। पिछले 15 सालों से समझा रही हूं कि पंडित अपनी ये सारी कुआदतें छोडो, लेकिन तुम हो की कुत्‍ता की पूंछ बन गई हो। कितना भी सीधा करो सीधा होती ही नहीं हो।    

खैर, असल बात पर आते हैं। गुडडू का स्‍कूल का नाम कमलाकर है। पांच फुट ग्‍यारह इंच का गबरू जवान है। खाते पीते घर का है, इसलिए देखने में सौ लडकों में अकेले दिखता है। लेकिन सुनने में उतना ही खराब। एक बार एक भिखारी सीताराम चाचा के घर भीख मांगने आया। दरवाजे पर गुडडू बैठा था। भिखारी ने दर्जनों आशीष उडेलते हुए बोला बाबू दो दिन से खाया नहीं हूं। थोडा खाने को मिल जाए। भूखे का पेट भरने से भगवान भी आपको आशिर्वाद देंगे। गुडडू कर्मयोगी है। अकेले का पेट भरने के लिए भगवान ने घर में सब कुछ दिया है। फिर भी वह साल में दो बार मुंबई कमाने जरूर जाता है। एक कर्मयोगी के सामने भिखारी था,  सो उपदेश के बोल फूट पडे। बोला भगवान ने मजबूत दो हाथ पैर दिये हैं। भीख मांगते शर्म नहीं आती। जाओ टमाटर खाओ।

उन दिनों बाजार में 40 रुपये किलो टमाटर बिक रहा था। भिखारी ने उपर से नीचे तक गुडडू को देखा और बोला क्‍या बाबू साहब भिखारी से मजाक कर रहे हैं। अगर टमाटर खाने की औकात होती तो भीख क्‍यों मांगता। अरे दो रोटी ही तो मांग रहा हूं। दे दीजिए भगवान आपका भला करेंगे। फिर गुडडू बोला यहां से जाओ और टमाटर खाओ। भूखे पेट भिखारी गुडडू के इस सुझाव पर अंदर ही अंदर पक रहा था। एक भिखारी से ऐसा मजाक। वह गुस्‍से में बोला बाबू साहब दो रोटी नहीं देना है तो मत दीजिए, लेकिन मेरे जैसे भूखे नंगे को इतना महंगा सुझाव भी मत दीजिए।

भिखारी अभी बोल ही रहा था कि चाचा कहीं से घुमते घामते वहां नमुदार हो गए। उन्‍होंने एक भिखारी को अपने दरवाजे पर नाराज देखा तो पूछ बैठे क्‍या बात है भाई,  क्‍यों नाराज हो रही हो। भूखे पेट भिखारी का गुस्‍सा देख्‍ाने लायक था। उसने कहा क्‍या बताउं बाबू साहब,  इस गांव में भी अजब गजब के लोग हैं। इस महंगाई के जमाने में भिखारी को सुझाव दे रहे हैं कि टमाटर खाओ। बताइए मेरी औकात 40 रुपये किलो टमाटर खाने की होती तो मैं भीख मांग रहा होता। चाचा की समझ में पूरा माजरा आ गया। उन्‍होंने गुडडू से कहा कि एक थाली में इसको भरपेट खाने भर का रोटी, चावल, दाल और सब्‍जी ले आओ।

गुडडू अंदर गया तो चाचा भिखारी को राज की बात बताने लगे। भाई तुम्‍हारी नाराजगी भी वाजिब है और गुडडू का सुझाव भी सोलह आने सच।  दरअसल गुडडू क को ट बोलता है। मेरा भतीजा बडा ही कर्मठी है। उसको हाथ पैर से सही सलामत लोग भीख मांगकर खाते अच्‍छे नहीं लगती। इसलिए तुमसे कह रही थी कि कमाकर खाओ।      

इस बार बीजी ने ठान लिया है कि अगले लगन में गुडडू का पार घाट लगाकर ही दम लेंगे। पंडित को पता है कि चाचा के बिना हाथ लगाए गुडडू जैसे दुल्‍हे का पार लगना मुश्किल है। गुडडू तो दुल्‍हों की तीसरी श्रेणी में पहुंच चुका है। गांव में लोग बताते हैं कि दुल्‍हों की तीन प्रजातियां होती हैं। पहली प्रजाति 18 से 25 साल के आयुवर्ग की होती है, जिसे वर कहते हैं। इस प्रजाति की शादियां धकाधक होती हैं। दूसरी होती है 26 से 30 वर्ष वालों की, जिनको बरनाठ कहते हैं और इनकी शादी बहुत मेहनत के बाद होती है। तीसरी प्रजाति होती है झरनाठों की। इस प्रजाति के दुल्‍हे 30 साल से उपर वाले होते हैं और गांवों में ये विरले पाये जाते हैं। अगर इस प्राजाति के दुल्‍हे की शादी हो जाए तो समझिये पत्‍थर पर दूब उग आया है। बीजी जानते हैं कि इसी प्रजाति का गुडडू है और इसकी शादी कराना पत्‍थर पर दूब उगाना तो नहीं लेकिन लोहे का चना चबाने जैसा है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. Is cement ke jungal mein kuchh to to lagaa apna saa, leking ye batao ki "dhokha hui ga baalam umar bachkani..." geet kahan se milega.


    Sukura

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  2. mast hai sir. Mujhe apne pados ka ek gaon yaad aa raha hai, jab shadi vyah ki baat hoti to log kahte falan gaon me har category ka dulha milega. Mere samajh me yeh baat nahi aati thi. Badon se poochhne me jhijhkata tha. aaj apne cofusion door kar diya.

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  3. Arre Guddua laut kar poore ganv ka baaza baza raha hai. Ganv vale mil kar uska baza tyun nahi bazwa dete.

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