रविवार, 24 जनवरी 2010

तीन कुत्‍ते


 
हमारे गांव में तकरीबन बाइस हजार इंसान हैं। हर इंसान की अपनी एक कहानी है। अगर एक-एक की कहानी एक दिन में पूरा करूं तो भी इसमें साठ साल लग जाएंगे। ...और ऐसा इस जन्‍म में कर पाना मुझे संभव नहीं लगता। वैसे हमारे सीतराम चाचा के पास कहानियों का इतना बडा जखीरा है कि उसी को समेटने बैठूं और करीने से समेट ले जाउं, तो इतना ही हमारे लिए काफी है।

चाचा की उनके हर उम्र की अलग और दिलचस्‍प कहानी है। जवानी के दिनों में हमारे सीताराम चाचा भी आज के युवा की तरह ही थे, जो हकीकत में कम और सपनों में ज्‍यादा जिया करते थे। ये ऐसे सपने होते हैं जो खुली आंखों से देखे जाते हैं। यह अलग बात है कि चाचा का जमाना कुछ और था। तब जीवन की रफ़तार इतनी तेज नहीं थी। तब कम्‍यूटर, मोबाइल, फर्राटा भरने वाली तेज गाडियों जैसे तेज रफ़तार के आधुनतम यंत्र भी नहीं थे। फिर भी जुम्‍मन, बीजी, बलेसर और नारद नामक चार चकोरों का मानना है कि उस समय भी इंसानी फितरत आज की तरह की ही थी। बातों का गोलमोल जवाब तब भी मिलता था और आज भी मिलता है।

बीजी पंडित को इस विषय का ज्ञान कुछ ज्‍यादा ही है। उन्‍होंने साधिकार बताया कि यह परंपरा बहुत ही पुरानी है। चंद्रगुप्‍त के राजगुरु चाणक्‍य से जब कोई पूछता आचार्य जी आप कहां जा रहे हैं, तो उनका जवाब होता था, अभी आ रहा हूं। इस परंपरा के सबसे बडे वाहक के रूप में चाणक्‍य का ही नाम लिया जा सकता है, क्‍योंकि चाणक्‍य यह नहीं बताते थे कि वो कहां जा रहे हैं, अलबत्‍ता इस बात का आश्‍वासन दे जाते थे कि जा कहीं भी रहा हूं, लेकिन लौट कर जरूर आउंगा।

जुम्‍मन ने कहा वैसे आमतौर पर ऐसी फितरत नेताओं की होती है। जो नेता बातों को गोल करने में जितना माहिर होता है, वह आज का सबसे बडा नेता है। इनको हमारे कस्‍बाई लोग श्रूड पॉलिटिशियन कहते हैं। चाचा का विचार इससे एक दम अलहदा है। उनका अपार अनुभव उनके विचार को और ताकत देता है। गोल मोल बातों पर उनके चार चकोरों की चर्चा और आगे बढने से पहले ही रूक गई।

सीताराम चाचा ने हस्‍तक्षेप किया। बिना नाडे के पैजामा हो तुम लोग। बे सिर पैर की बात करते हो। कितना तजुर्बा है तुम लोगों के पास। मेरे सामने अभी तुम चारों बच्‍चे हो। बात गोल करने की फितरत केवल इंसानों में ही नहीं है। बेचारे नेता तो बिना वजह बदनाम हैं। बातें गोल तो कुत्‍ते भी करते हैं। इस बारे में मुझे एक कहानी याद आती है ...


मोतिया, मोतीसरी और जग्‍गू तीन कुत्‍ते थे। जग्‍गू मोतिया और मोतीसरी का बेटा था। जाहिर है मोतिया सबसे तगडा, मोतीसरी थोडी दुबली और जग्‍गू सबसे कमजोर था। बहुत दिनों से गांव में कोई शादी नहीं हो रही थी। कोई मर भी नहीं रहा था। इसलिए बहुत दिनों से भोज-भात के लाले पडे थे। तीनों कुत्‍तों को सुस्‍वाद खाना खाए अरसा हो गया था। उनकी जुबान फीकी होने लगी थी। हालात यहां तक पहुंच गए थे कि उनके भौंकने में भी कुत्‍तागिरी कम आ पा रही थी।

अचानक एक दिन शाम को बगल वाले गांव से बैंड बाजे की आवाज आई। तीनों को लग गया पडोस में आज कोई भोज-भात है। उनको उस गांव के कुत्‍तों से ईर्श्‍या होने लगी। तीनों ने कहा, आज तो उस गांव के कुत्‍ते दावत उडाएंगे और हम अभागे ऐसे ही रह जाएंगे। जैसे-जैसे शाम ढलने लगी तीनों के मुंह से लार बेजार होकर टपकने लगी। सबसे बडा होने के नाते मोतिया ने फैसला किया कि आज कुछ भी हो जाए हम लोग भी दावत उडाने चलेंगे। अब हमसे बर्दास्‍त नहीं होता। लोग यह मानने लगे हैं कि फीके मुंह भौंकने से हमारी कुत्‍तागिरी पर बटटा लग रहा है। वहां चलेंगे तो ना ना प्रकार के व्‍यंजन का भोग लगेगा। हमारे गांव में निकट भविष्‍य में किसी दावत की संभावना दूर दूर तक नहीं दिखती। घर के मुखिया का फैसला था, सो तीनों उस गांव की ओर कूच कर गए।

जब उस गांव की सीमा पर पहुंचे तो तीनों के पांव अपने आप ठिठक गए। कुत्‍तों का भी उसूल है। दूसरे गांव के कुत्‍तों की सीमा में जाना अपने आप को दुश्‍मनों के चक्रव्‍यूह में अपने को झोंक देने से कम नहीं है। अपने घर में कुत्‍ते भी शेर होते हैं, इसका भान जग्‍गू को तो कम मोतिया और मोतिसरी को ठीक से हैं। तीनों के एक साथ दूसरे गांव में की सीमा में घुसते ही दूर से दिखाई दे जाने का खतरा था। इसलिए मोतिया ने कहा कि हम एक एक करके दावत उडाने जाएंगे। तय हुआ कि सबसे पहले जग्‍गू को भेजा जाएगा। अगर रिस्‍पांस ठीक रहा तो उसके बाद मोतिसरी और आखिर में मोतिया दावत उडाने जाएगा।

त‍य योजना पर फौरन अमल किया गया और जग्‍गू को मौका ए दावत पर रवाना कर दिया गया। भगवान का नाम लेकर जग्‍गू चला। लेकिन वह अंदर ही अंदर कांप रहा था। अगर दुश्‍मन गांव के कुत्‍तों ने मुझे देख लिया तो मेरी छोटी जान के लिए यह सौदा बहुत महंगा पडेगा। अगर उनके घेरे में आ गया तो पता नहीं कहां कहां से नोचेंगे, मेरा बाप भी नहीं गिन पाएगा। खैर, दूसरे गांव में दावत उडाने के रिस्‍क भी तो हैं। हमारी बिरादरी के लिए यही एउवेंचर है कि दूसरों के घर में घुसकर खाओ और सही सलामत अपने ठिकाने पहुंच जाओ।

इसी उधेड बुन में जग्‍गू दावते वलीमा वाली जगह पर पहुंच गया। वहां पहुच कर भगवान को लाख लाख लाख शुक्रिया अदा किया कि रास्‍ते में किसी दुश्‍मन ने मुझे नहीं देखा। चारो तरफ से कनात घिरी हुई थी। अंदर चहल पहल थी। घुसने का कोई रास्‍ता नहीं सूझ रहा था। वह कनात का चक्‍कर काटने लगा। एक जगह उसको कनात में एक सुराख दिखाई दी। सोचा मेरी काया छोटी है इसमें से निकल सकता हूं। पहली बार इस तरह के खतरनाक अभियान पर निकला था। एक सामान्‍य कुत्‍ता जितनी एहतियात बरत सकता है वो सब जग्‍गू कर रहा था। एहतियातन एक बार सूराख में सिर घुसाकर पहले उसने हालात का जायजा लिया। उसको जायजा लेते उस इंसान ने देख लिया, जिसको कुत्‍तों को कनात के भीतर नहीं फटकने देने की जिम्‍मेदारी दी गई थी।

गांव में कहीं भी भोज का आयोजन होता वहां कुत्‍तों से रख्‍ावाली की जिम्‍मेदारी उसे ही निभानी पडती थी। लोग बताते हैं कि उसने कुत्‍तों के स्‍वभाव पर शोध किया था। जग्‍गू के झरोखे से जायजा लेने के बाद वह समझ गया कि वह कुत्‍ता फिर उसी झरोखे से घुसने की कोशिश करेगा। हाथ में एक डंडा लेकर वह झरोखे के पास मोर्चा ले लिया। जग्‍गू तो निश्‍िचन्‍त था कि उसके यहां होने की न तो किसी कुत्‍ते को और न ही किसी इंसान को भनक है। वह उन्‍मुक्‍त होकर ज्‍यों ही अपना सिर कनात के झरोखे में डाला अचानक एक डंडा बहुत जोर से उसके सिर पर पडा... फटाक...।

अचानक आई इस विपदा का उसे इलहाम तक नहीं था। चोट बहुत तेज थी। जग्‍गू वहां से कांय कांय करते भागा। वह जब अपने मां बाप के पास पहुंचा तो दोनों ने उसे घेर लिया। पूछा क्‍या हुआ बेटा। जग्‍गू ने कहा मुझे तो वहां जाते ही मिल गया।

इस सकारात्‍मक जवाब को सुन मोतिसरी की बांछे खिल गईं। उसने सोचा इतना छोटा पिल्‍ला जब दावत उडा सकता है तो मुझे कौन रोक सकता है। मन ही मन पुडी पुलाव के स्‍वाद को याद कर वह मोतिया और जग्‍गू से इजाजत लेकर दावत स्‍थल के लिए रवाना हो गई।

इस तरह के दावतों का बहुत अनुभव था उसे। लंबी लंबी छलांगे मारती हुई वह वहां पहुंच गई। उसको रास्‍ते में उस गांव का कोई कुत्‍ता भी नहीं मिला। इसलिए मन से बचा खुचा भय भी जाता रहा। उसने सोचा कि क्‍यों न जहां भोजन तैयार हो रहा है उधर ही चलकर दावत उडा लिया जाए।

जहां पुडी तली जा रही थी, वह वहीं पहुंच गई। हलवाई ने देखा एक कुत्‍ता भोजनालय में घुस आया है। किसी ने देख लिया तो हमारा बनाया खाना कोई नहीं खएगा। उस कुत्‍ते को जल्‍दी से भगाने की गरज से पुडी के खौलते तेल को एक कलुछे से उसके उपर फेंक दिया। तेल से जली मोतिसरी कांय कांय करते वहां से भागी।

रास्‍ते में उसने सोचा कि अगर मैने सही बात बता दिया तो जग्‍गू और मोतिया मेरे उपर खूब हंसेंगे। एक छोटा सा बच्‍चा दावत उडाकर आ गया और इनको देखो एक पूडी तक के दर्शन नहीं हुए। वह कांय कांय करना बंद कर अचानक चुप हो गई। जब वह ठिकाने पर पहुंची तो दोनों ने पूछा क्‍या हुआ। उसने बताया कि मुझे तो गरम गरम मिल गया।

इतना सुनना था कि मोतिया मगन होकर बिना दोनों को कुछ बताये दावत उडाने चल पडा। उसकी चाल में गजब का आत्‍मविश्‍वास दिख रहा था। वैसे भी शरीर से भरा पूरा था, इसलिए उसकी चाल को देखकर यह लग रहा था कि कुत्‍ता नहीं शेर जा रहा है। जब वह दावत वाली जगह पर पहुंचा तो पहले सीना चौडाकर उस पूरे जगह का मुआयना किया। शरीर से हट़टा कटटा होने के नाते उसको दो चार पिददीनुमा कुत्‍तों का भय भी नहीं सता रहा था।

पूरे दावत स्‍थल का मुआयना करने के बाद उसे लगा कि इधर उधर जाने से बेहतर है भंडार घर में चलकर ही लजीज व्‍यंजन का स्‍वाद लिया जाय। कुत्‍ते का स्‍वभाव, जब रोक टोक नहीं हुआ तो मनमानी पर उतर आया और घुस गया भंडार घर में।

डंडे वाला कमाल का था। उसकी निगाह से किसी कुत्‍ते का बच पाना नामुमकिन था। उसने एक गबदू (भरे पूरे शरीर वाले) कुत्‍ते को भंडार में घुसते देख लिया। डंडा लेकर मोतिया के पीछे भंडार घर में घुसकर दरवाजा बंद कर लिया। अंदर पहुंचते ही मोतिया पर डंडे का प्रहार शुरू हो गया।

मोतिया डंडे की मार खाकर कभी पूडी पर गिर रहा था तो कभी सब्‍जी पर। एक डंडा तो इतना जोर से पडा कि वह रायते वाले बडे से भगौने में जा गिरा। इसी बीच खाना खिलाने वाले कोई सज्‍जन सब्‍जी लेने आ गये। दरवाजा ज्‍यों ही खुला मोतिया रास्‍ता पाकर तुरंत कांय कांय करते भाग निकला।

जब वह मोतिसरी और जग्‍गू के पास पहुंचा तो दोनों ने पूछा कि क्‍या हुआ। उसने सोचा कि सही बात अगर बता दिया तो इन दोनों के सामने उसकी नाक कट जाएगी। उसने अपनी बात में रूआब लाते हुए बताया, मुझे तो आने ही नहीं दे रहे थे। कोई कह रहा था, पूडी खाओ, कोई कह रहा था सब्‍जी खाओ। एक सज्‍जन ने तो इतना रायता खिला दिया कि मेरे शरीर पर भी फैल गया। तुम लोग देख नहीं रहे हो।

मोतिया इतना पिटा था कि अंदर से उसे किसी और खतरे का अहसास हो रहा था। उसने कहा, अब जल्‍दी से अपने गांव भाग चलो। मुझे लगता है कि हमारे आने की खबर दुश्‍मन गांव के कुत्‍तों को हो गई है। दोनों भी तो जल्‍दी से अपने गांव पहुंचना चाह रहे थे। बिना खाए मन में ही अपने शरीर पर इंसानों के ढाये सितम को याद करते तीनों अपने गांव की ओर चल पडे।

सीताराम चाचा ने कहानी खत्‍म कर जुम्‍मन मियां, बीजी पांडेय, नारद नाई और बलेसर धोबी की ओर मुखातिब होकर बोले। देख लिया बच्‍चों। कुत्‍ते भी गोल मोल जवाब देते हैं। यह फितरत केवल इंसानों में नहीं है। इतनी लंबी कहानी के दौरान बीजी पंडित को कई बार खैनी की तलब लगी, लेकिन चाचा को बीच में टोकना ठीक नहीं था। चाचा की वाणी ने ज्‍यों ही विराम लिया बीजी उनसे चुनौटी मांगकर खैनी चूना में तालमेल बिठाने लगे।

3 टिप्‍पणियां:

  1. Sir Bahut mast likha hai aapne. Itne saal se Gaon se door hoker bhi aapne jis tarah gano ki yadon ko sajon rakha hai, wah anukarneeya hai. Vastav me apki ye post padhkar bachpan ki yaden taaja ho gayee. Apne jo kahani likhi hai iske patra samaj me aj bhi nazar aate hain.

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  2. Aap ne asli baat to batai nai...ki ye band baaja aap ki shaadi ka tha. :-)

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